श्लोक

इन श्लोकों को याद रखें

सबेरे उठते समय :-

समुद्रवसने देवि! पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपलि! नमस्तुभ्यम्‌ पावस्पर्श क्षमस्व मे॥

समुद्ररूपी वस्त्रधारण करने वाली, पर्वतरूपी स्तनों वाली एवं भगवान श्रीविष्णु की पत्नी हे भूमिदेवी! मैं आपको प्रणाम करता हूं। मेरे पैरों का आपको स्पर्श होगा। इसलिए क्षमा चाहता हूँ।

भोजन के पहले :-

ब्रह्मार्षण ब्रह्महविर्‌ ब्रह्मग्रौ ब्रह्मणाहुतम्‌।
ब्रह्मैवतेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना।।

यज्ञ में किया जाने वाला समर्पण, यज्ञ में दी जाने वाली आहति (हवि आदि) ब्रह्म है। ब्रह्मरूपी अग्नि में ब्रह्म॒रूप होमकर्ता द्वारा जो हृवन किया गया, वह भी ब्रह्म है अतः ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष के द्वारा जो प्राप्त होने योग्य है वह ब्रह्म ही है।

सोने के पहले :-

राम स्कन्‍दं हनुमन्तं बैनतेयं वृकोदरम्‌।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नं तस्य नश्यति।

श्रीराम जी, कार्तिकेय जी, हनुमान जी, गरुड़ जी, भीमसेन को जो शयन करते समय स्मरण करता है उसके बुरे स्वप्न समाप्त हो जाते हैं।

शान्ति मंत्र :-

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्‍्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित्‌ दुःखभाग्भवेत्‌॥।

सभी सुखी होवे, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।